Palamu Tiger Reserve News: झारखंड हाई कोर्ट ने पलामू टाइगर रिजर्व में बाघों की सुरक्षा को लेकर सख्त रुख अपनाया है। गुरुवार को जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने वन विभाग के अधूरे जवाब पर कड़ी नाराजगी जताई। चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने पाया कि विभाग की ओर से दिए गए जवाब में कई महत्वपूर्ण सवालों का जिक्र ही नहीं किया गया।
कोर्ट की फटकार: आदेश को गंभीरता से नहीं लिया
सुनवाई के दौरान अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि पीसीसीएफ (PCCF) ने कोर्ट के आदेश को सही तरीके से पढ़ा ही नहीं और मामले को गंभीरता से नहीं लिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि इतने अहम मामले में कनीय अधिकारी के माध्यम से अधूरा जवाब दाखिल करना अदालत की अवमानना जैसा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वन और वन्यजीव राष्ट्रीय संपदा हैं और इन्हें अस्थायी विकास के संसाधन के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट ने दिए सख्त निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने कई अहम निर्देश जारी किए —
- पीसीसीएफ और संबंधित वन अधिकारी अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होंगे
- टाइगर रिजर्व के कोर एरिया को पूरी तरह मानव हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाए
- बाघों के प्राकृतिक प्रजनन को सुनिश्चित करने के लिए सख्त कदम उठाए जाएं
- कोर एरिया में स्थित कुजरूम गांव का विस्थापन मार्च 2026 के अंत तक पूरा किया जाए
केंद्र ने दिया जवाब, राज्य पर नाराजगी
इस मामले में केंद्र सरकार की ओर से जवाब दाखिल कर दिया गया है, लेकिन राज्य के वन विभाग की धीमी कार्रवाई पर अदालत ने असंतोष जताया है।
2 अप्रैल को अगली सुनवाई
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली सुनवाई 2 अप्रैल तय की है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि वन विभाग कोर्ट के निर्देशों का पालन किस तरह करता है और पलामू टाइगर रिजर्व में बाघों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
