तीन साल से ठप मानवाधिकार आयोग, 3 हजार के करीब मामले लंबित

Human Rights Commission stalled for Three Years: झारखंड में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए बनाई गई संवैधानिक संस्था झारखंड राज्य मानवाधिकार आयोग (Jharkhand State Human Rights Commission) पिछले तीन वर्षों से लगभग निष्क्रिय पड़ी हुई है।

वर्ष 2023 के बाद से आयोग में न तो अध्यक्ष हैं और न ही सदस्य सचिव।

मौजूदा स्थिति यह है कि आयोग के नाम पर केवल कुछ कर्मचारी काम कर रहे हैं, जबकि निर्णय लेने और सुनवाई करने वाला कोई जिम्मेदार पदाधिकारी मौजूद नहीं है। इसी कारण आयोग के पास इस समय करीब 2,944 मामले लंबित हैं।

न्याय की राह में अटका आयोग

राज्य के अलग-अलग हिस्सों से पुलिस अत्याचार, आदिवासी अधिकारों के उल्लंघन, महिलाओं और बच्चों के साथ अन्याय तथा अन्य मानवाधिकार हनन (Human Rights Abuses) से जुड़ी शिकायतें लगातार आयोग तक पहुंच रही हैं।

लेकिन अध्यक्ष और सदस्यों के अभाव में न तो इन मामलों की नियमित सुनवाई हो पा रही है और न ही सरकार को कोई सिफारिश भेजी जा रही है। अधिकतर शिकायतें सिर्फ दर्ज होकर फाइलों में बंद पड़ी हैं।

इससे पीड़ित (Victim) लोग वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा करने को मजबूर हैं और मानवाधिकार संरक्षण की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

आयोग का अब तक का सफर

Jharkhand State Human Rights Commission का गठन वर्ष 2011 में किया गया था। इसके पहले अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति नारायण राय बने थे, जिनका कार्यकाल पांच वर्ष का रहा।

इसके बाद मणिपुर के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आर.आर. प्रसाद को नौ महीने के लिए अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

फिर राज्यपाल के प्रधान सचिव रहे एस.के. सतपाठी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, जिनका कार्यकाल 5 मार्च 2023 तक रहा। इसके बाद से आयोग बिना अध्यक्ष और सदस्य सचिव के ही काम कर रहा है।

आंकड़े खुद बयां कर रहे हैं हालात

आयोग में दर्ज और निपटाए गए मामलों के आंकड़े भी इसकी बदहाली को दिखाते हैं।
2018 में 945 मामले दर्ज हुए, लेकिन केवल 91 का निपटारा हुआ।

2019 में 641 मामलों में से सिर्फ 20 निपटे।
2020 में 717 में से 78,
2021 में 715 में से 252,
और 2022 में 158 में से 112 मामलों का ही निपटारा हो सका।
वहीं 2023, 2024 और 2025 में दर्ज सैकड़ों मामलों का अब तक कोई निपटारा नहीं हो पाया है।

इस स्थिति से साफ है कि यदि जल्द नियुक्तियां नहीं हुईं, तो मानवाधिकारों की रक्षा सिर्फ कागजों तक सिमटकर रह जाएगी।

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