Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को लहसुन और प्याज पर रिसर्च कराने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता वकील को कड़ी फटकार लगाई। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने याचिकाओं की प्रकृति और ड्राफ्टिंग पर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की कि क्या ऐसी याचिकाएं आधी रात को ड्राफ्ट की जाती हैं।
दरअसल, याचिका में अदालत से एक कमेटी गठित कर यह शोध कराने का निर्देश देने की मांग की गई थी कि प्याज और लहसुन में कोई ‘तामसिक’ या नकारात्मक तत्व होते हैं या नहीं।
जैन समुदाय की भावनाओं का हवाला
याचिका में कहा गया था कि जैन समुदाय प्याज, लहसुन और जड़ वाली सब्जियों को तामसिक भोजन मानकर उनसे परहेज करता है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि यह मुद्दा सामाजिक रूप से भी सामने आता रहा है और हाल ही में गुजरात हाईकोर्ट में एक तलाक का मामला भी भोजन में प्याज होने को लेकर सामने आया था।
इस पर अदालत ने सवाल किया कि आखिर इस तरह की याचिका दायर कर जैन समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की जरूरत क्यों है।
तीन अन्य याचिकाएं भी खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने इसी वकील की ओर से दायर तीन अन्य जनहित याचिकाओं पर भी सुनवाई से इनकार कर दिया। इनमें शराब और तंबाकू उत्पादों में कथित हानिकारक सामग्री को नियंत्रित करने के निर्देश की मांग, संपत्तियों का अनिवार्य पंजीकरण सुनिश्चित कराने की मांग और शास्त्रीय भाषाओं की घोषणा को लेकर दिशानिर्देश बनाने की मांग शामिल थी।
अदालत बोली– नॉन एप्लिकेशन ऑफ माइंड का उदाहरण
पीठ ने सभी याचिकाओं को अस्पष्ट और तुच्छ बताते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि इन याचिकाओं की ड्राफ्टिंग बेहद खराब है और इनमें मांगी गई राहत भी स्पष्ट नहीं है, जिससे अदालत का कीमती समय बर्बाद होता है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह याचिका “नॉन एप्लिकेशन ऑफ माइंड” का उदाहरण है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अगर याचिकाकर्ता खुद वकील नहीं होते, तो इस तरह की याचिका पर भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता था।
भविष्य में लग सकता है भारी जुर्माना
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि इस तरह की तुच्छ और अस्पष्ट याचिकाएं अदालत पर अनावश्यक बोझ डालती हैं। अदालत ने साफ कहा कि भविष्य में अगर इस तरह की याचिकाएं दायर की गईं, तो उन पर असाधारण जुर्माना लगाया जा सकता है।

