US and Iran Peace Deal: इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई बहुप्रतीक्षित उच्च स्तरीय वार्ता आखिरकार बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। करीब 21 घंटे तक चली इस बातचीत का मकसद दो हफ्तों से जारी सीजफायर को स्थायी शांति में बदलना था। लेकिन जमीनी हालात और कूटनीतिक जटिलताओं ने इस कोशिश को नाकाम कर दिया। दुनिया भर में इस वार्ता को बेहद अहम माना जा रहा था। 1979 की इस्लामी क्रांति और तेहरान में अमेरिकी दूतावास संकट के बाद यह दोनों देशों के बीच सबसे उच्च स्तर की बातचीत थी। पाकिस्तान ने मध्यस्थता की भूमिका निभाई, लेकिन क्षेत्रीय तनाव के बीच सहमति बनना आसान नहीं रहा। 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिका-इज़रायल और ईरान के टकराव ने पहले ही वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित कर दिया था। पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ गई थी। ऐसे में यह वार्ता केवल दो देशों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वैश्विक स्थिरता से भी जुड़ी हुई थी। आइए जानते हैं इस वार्ता के फेल होने की 5 बड़ी वजहें।
1. अमेरिका और ईरान का अडिग रुख
इस्लामाबाद वार्ता में सबसे बड़ी बाधा दोनों देशों का सख्त रुख रहा। अमेरिका ने मांग रखी कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को तुरंत रोके और भविष्य में परमाणु हथियार न बनाने की गारंटी दे। इसके जवाब में ईरान ने साफ कहा कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है और वह किसी भी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं करेगा। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बातचीत के बाद कहा कि अमेरिका उस स्थिति तक भी नहीं पहुंच पाया जहां ईरान अमेरिकी शर्तों पर विचार करता। वहीं ईरान ने अमेरिकी प्रस्तावों को अनुचित बताया। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की “वेट एंड वॉच” रणनीति और अमेरिका की जल्द नतीजा चाहने की नीति के कारण बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी।
2. तनावपूर्ण माहौल ने बिगाड़ा माहौल
किसी भी शांति वार्ता के लिए भरोसा जरूरी होता है, लेकिन इस्लामाबाद वार्ता में भरोसे की कमी साफ दिखी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बातचीत से पहले और दौरान कई आक्रामक बयान दिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका फिर से हमले शुरू कर सकता है। इन बयानों से ईरान को लगा कि बातचीत दबाव की रणनीति के तहत हो रही है। इससे दोनों पक्षों के बीच अविश्वास और बढ़ गया और वार्ता कमजोर पड़ गई।
3. लेबनान पर हमलों ने बिगाड़ा समीकरण
जब इस्लामाबाद में बातचीत चल रही थी, उसी दौरान इज़रायल ने लेबनान में सैन्य अभियान जारी रखा। यह इलाका हिज्बुल्लाह के प्रभाव में माना जाता है, जिसे ईरान का करीबी सहयोगी समझा जाता है। ईरान ने मांग की कि शांति वार्ता से पहले लेबनान में हमले रोके जाएं। लेकिन इज़रायल ने साफ कर दिया कि अमेरिका-ईरान सीजफायर उस पर लागू नहीं होता। इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के इस रुख ने वार्ता को और जटिल बना दिया। इससे समझौते की संभावनाएं कमजोर पड़ गईं।
4. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना सबसे बड़ा विवाद
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इस वार्ता का सबसे संवेदनशील मुद्दा बनकर उभरा। यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम है। अमेरिका चाहता था कि इसे तुरंत खोला जाए ताकि तेल आपूर्ति सामान्य हो सके। वहीं ईरान इसे दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल कर रहा था। ईरान ने मांग की कि पहले उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दी जाए और सुरक्षा की गारंटी दी जाए। इसके बिना वह होर्मुज खोलने को तैयार नहीं था। ट्रंप ने इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया और किसी समझौते से इनकार कर दिया। इस वजह से वार्ता आगे नहीं बढ़ सकी।
5. भरोसे की कमी बनी सबसे बड़ी वजह
आखिरकार इस पूरी वार्ता की सबसे बड़ी कमजोरी दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी रही। दशकों से चले आ रहे तनाव ने विश्वास की गुंजाइश लगभग खत्म कर दी है। ईरान के वरिष्ठ नेता मोहम्मद बाघर ग़ालिबाफ ने पहले ही कहा था कि सद्भावना है, लेकिन भरोसा नहीं। यह बयान पूरी वार्ता की स्थिति को साफ दिखाता है। अमेरिका अपने प्रस्ताव को बेहतर बता रहा था, जबकि ईरान उसे एकतरफा मान रहा था। इसी बुनियादी मतभेद ने समझौते की संभावनाओं को खत्म कर दिया।
क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका
इस्लामाबाद वार्ता की विफलता ने मौजूदा सीजफायर को भी कमजोर कर दिया है। साथ ही पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता का खतरा बढ़ गया है। पाकिस्तान ने मध्यस्थता जारी रखने की बात कही है। हालांकि जब तक मुख्य मुद्दों पर सहमति नहीं बनती, तब तक स्थायी समाधान की उम्मीद कम ही नजर आ रही है।

