USA and Iran War: मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराने की पाकिस्तान की कोशिश ने नई चिंता पैदा कर दी है। सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान में आने वाला अमेरिकी-ईरानी प्रतिनिधिमंडल सुरक्षित रहेगा। पाकिस्तान में आतंकवाद का लंबा इतिहास रहा है और पहले भी विदेशी टीमों, सेना और राजनयिकों को निशाना बनाया जाता रहा है। ऐसे में सुरक्षा को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पाकिस्तान में आतंकवाद की समस्या कई दशकों से चली आ रही है। यहां कभी श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला हुआ, कभी पाकिस्तानी सेना के ठिकानों को निशाना बनाया गया, तो कभी विदेशी डिप्लोमेट्स पर हमले हुए। यही वजह है कि जब भी कोई बड़ा विदेशी प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान पहुंचता है, सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ जाती है।
2009 में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला, दुनिया दंग रह गई
2009 में पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी नाकामी सामने आई थी। 3 मार्च 2009 को लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम के पास श्रीलंकाई क्रिकेट टीम की बस पर आतंकियों ने हमला कर दिया। इस हमले में 6 पाकिस्तानी पुलिसकर्मी और 2 नागरिकों की मौत हुई, जबकि 6 श्रीलंकाई खिलाड़ी घायल हो गए।
हमलावरों ने एक मिनीवैन चालक को भी मार दिया था। इस घटना के बाद पाकिस्तान में कई सालों तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट बंद रहा। महेला जयवर्धने, कुमार संगकारा, अजंता मेंडिस, थिलन समरवीरा और थरंगा परनाविताना जैसे खिलाड़ी इस हमले में घायल हुए थे। इस हमले के पीछे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और लश्कर-ए-झंगवी जैसे संगठनों का नाम सामने आया। इस घटना ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
पाकिस्तानी सेना भी रही आतंकियों के निशाने पर
पाकिस्तान की सेना भी कई बार आतंकवादी हमलों का शिकार हुई है। 2009 में रावलपिंडी स्थित आर्मी जनरल हेडक्वार्टर्स पर हमला हुआ, जिसमें 9 सैनिक मारे गए।
2011 में मर्दान के ट्रेनिंग सेंटर पर हमले में 27 सैनिकों की मौत हुई। 2010 में लाहौर में सेना के काफिले पर दो आत्मघाती हमले हुए, जिसमें 40 से ज्यादा लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए।
2007 से 2009 के बीच पाकिस्तान में आतंकवाद चरम पर था और सुरक्षा बलों के सैकड़ों जवान मारे गए। 2014 में पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुआ हमला सबसे भयावह था। इसमें 149 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर स्कूली बच्चे थे।
हाल के वर्षों में भी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने सेना के ठिकानों को निशाना बनाया है। 2025 में भी आतंकवाद से जुड़ी मौतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसमें सुरक्षा बलों की बड़ी संख्या शामिल रही।
विदेशी डिप्लोमेट्स और संस्थान भी रहे निशाने पर
पाकिस्तान में विदेशी राजनयिकों को भी कई बार निशाना बनाया गया है। 1995 में कराची में दो अमेरिकी डिप्लोमेट्स की हत्या कर दी गई। 2002 में इस्लामाबाद के एक चर्च पर हमले में दो अमेरिकी नागरिक मारे गए।
विदेशी दूतावासों और डिप्लोमेटिक परिसरों पर भी कई बार हमले हुए। इन घटनाओं ने पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचाया और विदेशी प्रतिनिधिमंडलों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई।
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा से बढ़ी चिंता
रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के लिए इस्लामाबाद में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल आने वाला है। इसमें अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस, विशेष दूत स्टीव विटकोफ और जैरेड कुश्नर जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं।
पाकिस्तान सरकार ने फुलप्रूफ सुरक्षा का दावा किया है। सेना और सुरक्षा एजेंसियों को तैनात किया गया है। हालांकि, पिछली घटनाओं को देखते हुए सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है।
आतंकवाद अभी भी बड़ी चुनौती
पाकिस्तान में आतंकवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। 2025 के ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स में पाकिस्तान पहले स्थान पर पहुंच गया। इस दौरान आतंकवाद से जुड़ी 1139 मौतें दर्ज की गईं।
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और अन्य संगठन अब भी सक्रिय हैं। ऐसे में हाई-प्रोफाइल विदेशी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा के दौरान किसी भी चूक का खतरा बना रहता है।
इतिहास की वजह से उठ रहे सुरक्षा पर सवाल
पाकिस्तान सरकार सुरक्षा के कड़े इंतजाम का दावा कर रही है, लेकिन पुरानी घटनाएं लगातार याद दिलाती हैं कि खतरा अभी भी बना हुआ है।
जब तक पाकिस्तान आतंकवाद की जड़ों को खत्म नहीं करता और सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह मजबूत नहीं बनाता, तब तक श्रीलंकाई टीम, सेना, डिप्लोमेट्स और अब अमेरिकी-ईरानी प्रतिनिधिमंडल जैसी यात्राओं पर सवाल उठते रहेंगे।

