सरायकेला में चैत्र पर्व की परंपरा पर सख्त रुख, राजा प्रताप आदित्य सिंह देव ने प्रशासन को दी नसीहत

Seraikela Takes a Tough Stand on the Tradition of Chaitra festival: सरायकेला रियासत के उत्तराधिकारी राजा प्रताप आदित्य सिंह देव ने शनिवार को Press Conference कर चैत्र पर्व और छऊ नृत्य की मौलिकता को लेकर कड़ा रुख अपनाया।

उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि चैत्र पर्व सरायकेला की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा है और इसके स्वरूप से किसी तरह की छेड़छाड़ स्वीकार नहीं की जाएगी।

‘महोत्सव’ के नाम पर परंपरा से हो रही छेड़छाड़

Raja Pratap Aditya Singh Deo ने कहा कि जब से सरायकेला जिला बना है, तब से चैत्र पर्व को ‘महोत्सव’ का रूप देकर इसमें कई बाहरी सांस्कृतिक कार्यक्रम जोड़े जा रहे हैं। उनका कहना है कि इससे पूर्वजों की स्थापित परंपरा और पूजा-पाठ की शुचिता पर असर पड़ रहा है।

उन्होंने कहा, “चैत्र पर्व कोई साधारण उत्सव नहीं है, यह हमारी धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ा अनुष्ठान है। इसे महोत्सव बनाकर इसके मूल स्वरूप को बदलना ठीक नहीं है।”

भारत सरकार से हुए समझौते का किया जिक्र

प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों (Historical Facts) का हवाला देते हुए बताया कि जब सरायकेला रियासत का भारत संघ में विलय हुआ था, उस समय भारत सरकार के साथ हुए समझौते में यहां की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को यथावत रखने की शर्त शामिल थी।

उनका कहना था कि प्रशासन को उस Agreement का सम्मान करना चाहिए और पारंपरिक अनुष्ठानों में किसी तरह का बदलाव नहीं करना चाहिए।

‘सरायकेला की आत्मा उड़िया संस्कृति से जुड़ी’

राजा प्रताप आदित्य सिंह देव ने कहा कि भौगोलिक रूप से सरायकेला भले ही आज झारखंड का हिस्सा है, लेकिन यहां की आत्मा और परंपरा उड़िया संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है।

उन्होंने बताया कि यहां के सभी धार्मिक रीति-रिवाज आज भी पुरी के पंचांग के आधार पर तय होते हैं। चैत्र मास का अंतिम दिन इस पर्व की आखिरी रात होती है, जिसका अपना विशेष आध्यात्मिक और अनुष्ठानिक महत्व है।

प्रशासन को दिया सकारात्मक सुझाव

विरोध के साथ-साथ राजा प्रताप आदित्य सिंह देव ने प्रशासन को एक सकारात्मक विकल्प भी दिया। उन्होंने कहा कि यदि प्रशासन बड़े स्तर पर महोत्सव आयोजित करना चाहता है, तो उसे 15 दिन बाद यानी 30 अप्रैल को किया जा सकता है।

उन्होंने सुझाव दिया कि 30 अप्रैल को सरायकेला के जिला स्थापना दिवस के अवसर पर महोत्सव आयोजित किया जाए। उस कार्यक्रम में वे स्वयं और रियासत से जुड़े लोग पूरा सहयोग करेंगे और खुशी-खुशी भाग भी लेंगे।

राजा ने अंत में कहा, “हम महोत्सव के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन चैत्र पर्व के पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। प्रशासन अगर अलग तारीख पर आयोजन करेगा, तो हम पूरा समर्थन देंगे।”

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