UAPA Removed: रांची से जुड़े एक अहम आपराधिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा निर्णय सुनाया है। अदालत ने विनोद पांडे के खिलाफ UAPA (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत मुकदमा चलाने की राज्य सरकार की अनुमति को रद्द कर दिया है।
Supreme Court के आदेश के बाद अब ATS रांची द्वारा दर्ज केस नंबर 1/2022 में आरोपियों के खिलाफ सिर्फ IPC/BNS की धाराओं में ही सुनवाई होगी।
विनोद पांडे की अपील पर आया फैसला
यह फैसला विनोद पांडे की ओर से दायर अपील याचिका पर सुनवाई के बाद आया।
Supreme Court ने साफ कहा कि UAPA जैसे सख्त कानून के तहत मुकदमा चलाने के लिए ठोस और नए तथ्यों का होना जरूरी है, जो इस मामले में नहीं पाए गए।
ATS रांची ने क्या लगाया था आरोप
गौरतलब है कि एंटी टेररिस्ट स्क्वायड (ATS) रांची ने अमन श्रीवास्तव, उसके परिवार और गैंग के खिलाफ केस दर्ज किया था।
इस मामले में यह आरोप लगाया गया था कि विनोद पांडे, अमन श्रीवास्तव गैंग (Aman Srivastava Gang) का सदस्य है और वह रंगदारी वसूलने व लोगों में दहशत फैलाने का काम करता है।
छापेमारी में भारी रकम की बरामदगी
ATS की छापेमारी के दौरान विनोद पांडे के पास से 5.42 लाख रुपये और सिद्धार्थ साहू के पास से 28.55 लाख रुपये नकद जब्त किए गए थे।
इसी केस में अमन श्रीवास्तव समेत कुल 19 लोगों के खिलाफ UAPA के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इन सभी को UAPA से राहत मिली है।
तीन बार भेजा गया था UAPA का प्रस्ताव
जानकारी के अनुसार, उपायुक्त की ओर से विनोद पांडे और अन्य आरोपियों पर UAPA लगाने के लिए राज्य सरकार को तीन बार प्रस्ताव भेजा गया था।
पहले दो प्रस्तावों को सरकार ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उनमें पर्याप्त और ठोस तथ्य नहीं हैं।
तीसरे प्रस्ताव पर उठे सवाल
तीसरी बार भी जब प्रस्ताव भेजा गया, उसमें कोई नया या मजबूत तथ्य नहीं जोड़ा गया था।
इसके बावजूद राज्य सरकार ने UAPA की धारा 16, 17, 18, 20 और 21 के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। इसी आदेश को विनोद पांडे ने पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने की।
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि तीसरी बार भेजे गए प्रस्ताव में क्या कोई नया तथ्य था। सरकार के वकील ने माना कि ऐसा कोई नया तथ्य नहीं था।
अंतिम फैसला क्या रहा
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद Supreme Court ने कहा कि बिना नए और ठोस आधार के UAPA लगाने की अनुमति देना कानूनन सही नहीं है।
इसलिए राज्य सरकार का आदेश रद्द किया जाता है। अब इस केस में आरोपियों पर सिर्फ IPC/BNS के तहत ही मुकदमा चलेगा।

