US pressure on India increases: रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर एक बड़ा और निर्णायक फैसला लेने का दबाव तेजी से बढ़ रहा है।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, अमेरिका की ओर से संभावित ऊंचे टैरिफ का खतरा भारत के लिए इस मुद्दे को और गंभीर बना रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने 4 जनवरी को साफ चेतावनी दी थी कि अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद नहीं करता है, तो अमेरिका भारतीय सामानों पर टैरिफ बढ़ा सकता है।
यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब भारत के अमेरिकी निर्यात पहले से दबाव में हैं। फिलहाल भारत के उत्पादों पर कुल 50% तक आयात शुल्क लगाया जा रहा है, जिसमें से आधा शुल्क सीधे तौर पर रूस से कच्चा तेल खरीदने से जुड़ा बताया जा रहा है।
अमेरिका की रणनीति क्या है? सेकेंडरी टैरिफ की तैयारी
अमेरिका में Republican Senator Lindsay ग्राहम एक ऐसा कानून लाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भारी सेकेंडरी टैरिफ लगाया जा सके।
GTRI के मुताबिक, अगर रूस अगले 50 दिनों के भीतर यूक्रेन युद्ध में युद्धविराम पर सहमत नहीं होता है, तो यह कानून लागू हो सकता है।
इसके बाद रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों के लिए अमेरिका के साथ व्यापार करना बेहद महंगा हो जाएगा और उन्हें परोक्ष रूप से रूस को आर्थिक मदद देने वाला माना जाएगा।
भारत ने अब तक क्या कदम उठाए हैं?
भारत ने इस दबाव के बीच कुछ सतर्क कदम भी उठाए हैं। अक्टूबर में अमेरिका ने रूसी तेल कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगाए थे।
इसके बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज समेत कई सरकारी रिफाइनरी कंपनियों ने संकेत दिया कि वे सेकेंडरी प्रतिबंधों से बचने के लिए इन कंपनियों से तेल खरीदने से परहेज करेंगी।
हालांकि, रूस से तेल का आयात पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। GTRI का कहना है कि मात्रा जरूर घटी है, लेकिन सप्लाई अभी भी जारी है।
इसी कारण भारत एक ऐसे “रणनीतिक ग्रे जोन” में फंसा हुआ है, जहां स्थिति स्पष्ट नहीं है और हर कदम जोखिम भरा है।
भारत के सामने अब क्या विकल्प हैं?
1. पहला, अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद करना चाहता है, तो उसे यह फैसला मजबूती और स्पष्टता के साथ लेना होगा।
2. दूसरा, अगर वह गैर-प्रतिबंधित रूसी सप्लायर्स से तेल खरीद जारी रखना चाहता है, तो उसे खुलकर यह बात स्वीकार करनी होगी और ठोस आंकड़ों से इसे साबित करना होगा।
3. तीसरा, अगर भारत प्रतिबंधित रूसी कंपनियों से भी तेल खरीदने को तैयार है, तो उस रुख को भी स्पष्ट रूप से सामने रखना होगा।
बीच का रास्ता अब संभव नहीं
GTRI ने साफ कहा है कि अब “बीच का रास्ता” अपनाने का समय निकल चुका है। अमेरिका की मांगों में अनिश्चितता के चलते यह फैसला और कठिन हो गया है।
यहां तक कि अगर भारत रूस से तेल का आयात पूरी तरह बंद भी कर देता है, तब भी Washington का दबाव खत्म हो, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
अमेरिका इसके बाद कृषि, डेयरी बाजार तक पहुंच, डिजिटल व्यापार या Data Governance जैसे अन्य मुद्दों को लेकर भी भारत पर दबाव बना सकता है।
ऐसे में भारत के लिए यह सिर्फ तेल का सवाल नहीं, बल्कि व्यापक रणनीतिक और व्यापारिक संतुलन का फैसला बन चुका है।

