पेट्रोल 4 डॉलर पार, जनता नाराज़

Iran and Israel War: ईरान के साथ जारी तनाव के बीच अमेरिका में महंगाई तेजी से बढ़ रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी रैलियों में ईरान पर हमले को देश की सुरक्षा से जोड़ रहे हैं। लेकिन आम जनता बढ़ती तेल और गैस की कीमतों से परेशान है। अमेरिका में सोमवार को पेट्रोल की कीमत तीन साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। कीमत 4 डॉलर प्रति गैलन के पार चली गई। इससे जनता में नाराजगी बढ़ती जा रही है। देशभर में ट्रंप सरकार के खिलाफ प्रदर्शन भी हो रहे हैं। ताजा सर्वे में भी युद्ध को लेकर जनता का गुस्सा साफ दिखाई दे रहा है।

सर्वे में युद्ध खत्म करने की मांग

रॉयटर्स-इप्सोस के ताजा सर्वे के मुताबिक दो-तिहाई अमेरिकी चाहते हैं कि अमेरिका ईरान युद्ध में अपनी भागीदारी जल्द खत्म करे। यह सर्वे शुक्रवार से रविवार के बीच किया गया। इसमें करीब 66 फीसदी लोगों ने कहा कि भले ही सरकार अपने सभी लक्ष्य हासिल न कर पाए, लेकिन युद्ध खत्म होना चाहिए।

वहीं 22 फीसदी लोगों का मानना है कि अमेरिका को अपने सभी टारगेट हासिल करने चाहिए, चाहे संघर्ष लंबा क्यों न चले।
करीब 6 फीसदी लोगों ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया।

रिपब्लिकन समर्थकों में भी बंटी राय

सबसे बड़ी बात यह है कि ट्रंप के अपने समर्थकों में भी मतभेद दिख रहे हैं। करीब 40 फीसदी रिपब्लिकन समर्थक तुरंत जंग खत्म करने के पक्ष में हैं। जबकि 57 फीसदी समर्थक लंबे समय तक युद्ध जारी रखने के पक्ष में हैं।

लोकप्रियता में गिरावट और बढ़ती नाराजगी

पिछले साल जनवरी में व्हाइट हाउस में वापसी के बाद से ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट देखी जा रही है। दूसरे कार्यकाल में लोकप्रियता में गिरावट सामान्य मानी जाती है। लेकिन इस बार महंगाई और बढ़ते खर्च ने नाराजगी को और बढ़ा दिया है।

तेल की कीमतें और चुनाव का सीधा रिश्ता

इतिहास बताता है कि अमेरिका में तेल की कीमतों का चुनावी नतीजों पर सीधा असर पड़ता है। तेल की कीमतें बढ़ने का मतलब अक्सर सत्ता में बैठी पार्टी को नुकसान होता है। 2014 से 2022 तक यही ट्रेंड देखने को मिला है।

बुश से ओबामा तक महंगाई का असर

साल 2006 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल में तेल की कीमत 56 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई थी। इसका असर चुनाव में पड़ा और उनकी पार्टी को 30 सीटों का नुकसान हुआ।

साल 2010 में राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में तेल की कीमत 76 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इसका असर मिड-टर्म चुनाव में पड़ा और डेमोक्रेट्स को 64 सीटों का नुकसान हुआ।

साल 2014 में भी ओबामा के नेतृत्व में डेमोक्रेट्स को 13 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा।

ट्रंप के पहले कार्यकाल का अनुभव

मार्च 2018 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान तेल की कीमत 61 डॉलर प्रति बैरल थी। इसके बावजूद रिपब्लिकन पार्टी को 42 सीटों का नुकसान हुआ।
विशेषज्ञों का कहना है कि मार्च से सितंबर के बीच तेल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई थी। यही चुनावी नुकसान की बड़ी वजह बनी।

बाइडेन अपवाद क्यों रहे

इस मामले में जो बाइडेन अपवाद माने जाते हैं। उनके कार्यकाल में तेल की कीमतें काफी ज्यादा रहीं। इसके बावजूद उन्हें केवल 9 सीटों का नुकसान हुआ।

चुनाव में महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा

यह साफ है कि अमेरिका में भी महंगाई चुनाव का बड़ा मुद्दा बनती है। तेल और पेट्रोल की कीमतें सीधे वोटरों के फैसले को प्रभावित करती हैं।

क्या चुनावी दबाव में नरम पड़ सकते हैं ट्रंप

ट्रंप सरकार को पहले से ही महंगाई को लेकर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ईरान से खतरे का नैरेटिव भी जनता की नाराजगी को कम नहीं कर पा रहा है।
ऐसे में माना जा रहा है कि मिड-टर्म चुनाव को देखते हुए ट्रंप युद्ध को लेकर नरम रुख अपना सकते हैं। क्योंकि इस बार मुद्दा सिर्फ जंग का नहीं बल्कि चुनावी भविष्य का भी है।

Hot this week

ताला तोड़कर लाखों की चोरी का खुलासा, CCTV से पकड़े गए दो शातिर चोर

Ranchi : राजधानी रांची के लालपुर थाना क्षेत्र में...

रांची के हटानिया तालाब में डूबने से युवक की मौत

Ranchi : रांची के हटानिया तालाब में शुक्रवार को...

Topics

ताला तोड़कर लाखों की चोरी का खुलासा, CCTV से पकड़े गए दो शातिर चोर

Ranchi : राजधानी रांची के लालपुर थाना क्षेत्र में...

रांची के हटानिया तालाब में डूबने से युवक की मौत

Ranchi : रांची के हटानिया तालाब में शुक्रवार को...

माओवादी नेता ‘किशन दा’ का निधन, जेल में ली आखिरी सांस

Ranchi : प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा (माओवादी) के शीर्ष...
spot_img

Related Articles

Popular Categories

spot_imgspot_img