Iran and Israil War: अमेरिका और इजरायल के हमलों से जूझ रहे ईरान के सामने अब एक और चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। खबर है कि कुर्द लड़ाके ईरान के अंदर घुसने की तैयारी कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका इन कुर्द लड़ाकों को गुपचुप तरीके से हथियार देने की योजना बना रहा है। इसी वजह से ईरान की शक्तिशाली सेना IRGC ने कुर्द लड़ाकों के ठिकानों पर हमले भी किए हैं।
ईरान और कुर्दों की दुश्मनी नई नहीं
कुर्द समुदाय और ईरानी शासन के बीच टकराव का इतिहास काफी पुराना है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान की नई सरकार ने कुर्द विद्रोहियों के खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान चलाया था। उस दौरान कई कुर्द कस्बे और गांव तबाह कर दिए गए थे। हजारों लोग मारे गए और लाखों कुर्दों को सीरिया और इराक की ओर पलायन करना पड़ा।
शाह के दौर में भी कुर्दों पर दमन
इस्लामिक क्रांति से पहले शाह मोहम्मद रजा पहलवी के शासनकाल में भी कुर्द समुदाय खुद को हाशिए पर महसूस करता था। सांस्कृतिक और राजनीतिक अधिकारों की कमी के कारण कुर्दों ने कई बार विद्रोह किया। इसी संघर्ष के बीच एक समय ऐसा भी आया जब कुर्दों ने ईरान से अलग एक देश बनाने की घोषणा कर दी थी।
जब बना था ‘रिपब्लिक ऑफ महाबाद’
22 जनवरी 1946 को कुर्द नेता काज़ी मुहम्मद ने ईरान के उत्तर-पश्चिमी इलाके महाबाद में एक अलग देश की घोषणा की थी, जिसे रिपब्लिक ऑफ महाबाद या रिपब्लिक ऑफ कुर्दिस्तान कहा गया। काज़ी मुहम्मद लंबे समय से कुर्दों की स्वायत्तता के लिए संघर्ष कर रहे थे और उसी आंदोलन के तहत उन्होंने यह कदम उठाया।
सोवियत समर्थन से खड़ा हुआ था नया देश
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया की राजनीति तेजी से बदल रही थी। उसी दौर में सोवियत संघ के समर्थन से कुर्द विद्रोहियों ने उत्तरी ईरान के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया। इसके बाद कुर्द नेताओं ने इन इलाकों को अलग देश के रूप में घोषित कर दिया। कोमाला-ए-जियान-ए-कुर्द नाम के संगठन ने इस गणराज्य के गठन में अहम भूमिका निभाई और काज़ी मुहम्मद इसके राष्ट्रपति बने।
कम संसाधनों के बावजूद हुई अच्छी शुरुआत
रिपब्लिक ऑफ महाबाद ने सीमित संसाधनों के बावजूद कई बड़े कदम उठाए। कुर्द भाषा में शिक्षा को बढ़ावा दिया गया, साहित्य प्रकाशित हुआ और महिलाओं की शिक्षा पर भी जोर दिया गया। इस नए देश ने अपनी सेना भी बनाई, जिसे पेशमर्गा कहा गया।
सिर्फ एक साल में खत्म हो गया देश
हालांकि यह देश ज्यादा समय तक टिक नहीं सका। शीत युद्ध की राजनीति में बदलाव के बाद सोवियत संघ ने अपना समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद दिसंबर 1946 में ईरानी सेना ने महाबाद पर फिर से कब्जा कर लिया। कुर्द भाषा के स्कूल बंद कर दिए गए, किताबें जला दी गईं और पूरे प्रशासन को खत्म कर दिया गया।
कुर्द राष्ट्रपति को दे दी गई फांसी
काज़ी मुहम्मद को गिरफ्तार कर लिया गया और संक्षिप्त मुकदमे के बाद 31 मार्च 1947 को उन्हें अन्य कुर्द नेताओं के साथ फांसी दे दी गई। इसके साथ ही रिपब्लिक ऑफ महाबाद का अंत हो गया।
आज भी जिंदा है कुर्दिस्तान का सपना
भले ही यह गणराज्य सिर्फ एक साल चला, लेकिन इसने कुर्द आंदोलन पर गहरा असर छोड़ा। आज भी तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया में फैले कुर्द समुदाय के बीच अलग कुर्दिस्तान बनाने की मांग समय-समय पर उठती रहती है। हालांकि बदलती अंतरराष्ट्रीय राजनीति और क्षेत्रीय समीकरणों के कारण यह सपना अब भी काफी जटिल और दूर नजर आता है।

