Iran and Israel War: ईरान की संसद परमाणु अप्रसार संधि (NPT) से बाहर निकलने की संभावना पर विचार कर रही है। यह कदम उठाने पर ईरान परमाणु हथियार विकसित करने से जुड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से काफी हद तक मुक्त हो सकता है। साथ ही उसके परमाणु कार्यक्रम पर वैश्विक निगरानी भी कमजोर पड़ जाएगी। मौजूदा तनाव और जंग जैसे हालात के बीच ईरान ने इस कदम को सही ठहराने की कोशिश की है। ईरान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव और ‘बुलिंग’ का हवाला दिया है। यह खबर ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका पर ईरान के यूरेनियम भंडार पर कब्जा करने की योजना बनाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
ईरान का सवाल — संधि में रहने का फायदा क्या
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि ऐसी संधि में शामिल होने का क्या फायदा, जहां दबाव डालने वाले देश ईरान को उसके अधिकारों का लाभ नहीं लेने देते और उसके परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले भी करते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ने कभी परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं की है और भविष्य में भी ऐसा करने की योजना नहीं है।
नीति में बड़े बदलाव की तैयारी
रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान व्यापक नीति बदलाव पर विचार कर रहा है। इसमें NPT से बाहर निकलना, 2014 के परमाणु समझौते से जुड़े काउंटरमेजर कानून को रद्द करना और परमाणु तकनीक के शांतिपूर्ण विकास के लिए BRICS देशों सहित समान विचारधारा वाले देशों के साथ नया अंतरराष्ट्रीय ढांचा तैयार करना शामिल है।
अमेरिका और इजरायल के आरोप
अमेरिका का आरोप है कि ईरान चोरी-छिपे परमाणु हथियार बनाने की दिशा में काम कर रहा है। इसी आरोप के बीच 28 फरवरी को अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया था। हालांकि ईरान ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
इससे पहले पिछले साल जून में अमेरिका ने ईरान के तीन प्रमुख परमाणु ठिकानों — फोर्डो यूरेनियम संयंत्र, नतांज परमाणु संयंत्र और इस्फहान को निशाना बनाया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि ईरान ने इन ठिकानों से करीब 400 किलोग्राम यूरेनियम स्थानांतरित किया था, जिसे आगे हथियारों के इस्तेमाल के लिए संसाधित किया जा सकता है।
बढ़ सकती है पश्चिम एशिया में अस्थिरता
ईरानी अधिकारियों का कहना है कि देश का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि 1970 की इस संधि से बाहर निकलने पर ईरान की परमाणु गतिविधियों पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी कमजोर हो जाएगी। इससे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ सकता है और नए प्रतिबंधों या कूटनीतिक अलगाव की स्थिति भी पैदा हो सकती है। गौरतलब है कि 2018 के बाद ईरान का परमाणु कार्यक्रम तेजी से विकसित हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने भी ईरान के बढ़ते उच्च समृद्ध यूरेनियम भंडार को लेकर कई बार चिंता जताई है।

