West Bengal: पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार बड़ा बदलाव देखने को मिला। लंबे समय से मजबूत माने जा रहे किले में सेंध लगी और इसके पीछे BJP के कुछ बड़े रणनीतिक चेहरों की अहम भूमिका रही।
अमित शाह का मैदानी मैनेजमेंट
इस पूरी रणनीति के केंद्र में रहे अमित शाह। उन्होंने करीब 15 दिनों तक बंगाल में डेरा डालकर चुनावी अभियान को मिशन मोड में चलाया। दिन में रैलियां और रोड शो, तो रात में बैठकों के जरिए उन्होंने संगठन को मजबूत किया। 50 से ज्यादा कार्यक्रमों के जरिए कार्यकर्ताओं में जोश भरा और वोटरों तक सीधा संदेश पहुंचाया।
घोषणाओं से बनाया माहौल
सरकारी कर्मचारियों के लिए सातवां वेतन आयोग लागू करने और कानून-व्यवस्था सुधारने जैसे वादों ने मतदाताओं को प्रभावित किया।
पहले चरण के बाद बीजेपी की बढ़त का दावा भी मनोवैज्ञानिक बढ़त साबित हुआ।
धर्मेंद्र प्रधान की रणनीतिक पकड़
धर्मेंद्र प्रधान ने पूरे अभियान की रणनीति संभाली। उन्होंने अलग-अलग सामाजिक और जातीय समूहों को साधते हुए केंद्र और राज्य के बीच तालमेल बनाए रखा।
भूपेंद्र यादव का माइक्रो मैनेजमेंट
भूपेंदर यादव ने बूथ स्तर तक संगठन को एक्टिव किया। कानूनी और चुनावी चुनौतियों को संभालते हुए जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूती दी।
सुनील बंसल का संगठन नेटवर्क
सुनील बंसल ने ‘पन्ना प्रमुख’ मॉडल के जरिए मजबूत कार्यकर्ता नेटवर्क खड़ा किया। इससे बीजेपी ने टीएमसी के कैडर सिस्टम को सीधी टक्कर दी।
बिप्लब देब का आक्रामक प्रचार
बिप्लब कुमार देब ने अपने अनुभव से खास इलाकों में प्रचार को धार दी। उनकी शैली ने कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा।
डिजिटल मोर्चे पर अमित मालवीय
अमित मालवीय ने सोशल मीडिया पर नैरेटिव की लड़ाई संभाली। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाकर विपक्ष को जवाब दिया।
टीमवर्क से मिली जीत
इन सभी नेताओं के तालमेल और रणनीति ने मिलकर बीजेपी को बंगाल में नई ताकत दी। यह जीत सिर्फ एक नेता की नहीं, बल्कि मजबूत संगठन, प्लानिंग और लगातार मेहनत का नतीजा मानी जा रही है।

