Supreme Court India : सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को अभी वोट देने से रोका जाता है और वह आगामी विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) में मतदान नहीं कर पाता, तो बाद में ट्रिब्यूनल के जरिए उस गलती को सुधारा जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल के हर फैसले को अपने आप अंतिम सूची में शामिल नहीं किया जाएगा। खासकर, जो फैसले तय समय सीमा (Cut-Off) के बाद आते हैं, उन्हें सप्लीमेंट्री लिस्ट में जोड़ना संभव नहीं हो सकता।
हालांकि, कोर्ट ने जोर देकर कहा कि किसी के वोट के अधिकार को हमेशा के लिए खत्म नहीं किया जा सकता।
यह मामला चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच के सामने आया। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, श्याम दीवान, मेनका गुरुस्वामी, गोपाल शंकरनारायणन और कल्याण बनर्जी ने पक्ष रखा, जबकि चुनाव आयोग की ओर से दामा शेषाद्रि नायडू पेश हुए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में चल रही वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया पर संतोष जताया। कोर्ट को बताया गया कि 31 मार्च तक करीब 60 लाख में से 47.4 लाख आपत्तियों का निपटारा किया जा चुका है। रोजाना लगभग 1.75 लाख से 2 लाख मामलों का समाधान हो रहा है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि वह केवल मौखिक दलीलों के आधार पर कोई फैसला नहीं ले सकती। याचिकाकर्ताओं ने बड़ी संख्या में नए वोटर रजिस्ट्रेशन (फॉर्म 6) को लेकर चिंता जताई थी।
चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने के खिलाफ अपील सुनने के लिए 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाए हैं, जिनकी अध्यक्षता हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस और जज कर रहे हैं। अब इस मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को होगी।

