Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारी अनुशासन और सेवा नियमों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ड्यूटी से अनधिकृत अनुपस्थिति के मामलों में तब तक किसी कर्मचारी को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता, जब तक यह साबित न हो जाए कि उसने जानबूझकर ड्यूटी नहीं की। यह फैसला चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस दीपक रोशन की खंडपीठ ने दिया।
क्या है मामला
यह मामला एक सहायक शिक्षक से जुड़ा है, जो नियुक्ति के तीन साल बाद गंभीर अवसाद (डिप्रेशन) से पीड़ित हो गया था। इलाज के लिए उसने छुट्टी ली और इसकी जानकारी रजिस्टर्ड डाक से विभाग और स्कूल प्रबंधन को दी। करीब सात साल इलाज के बाद डॉक्टर ने उसे फिट घोषित किया। इसके बाद उसने दोबारा ड्यूटी जॉइन करने की कोशिश की, लेकिन अधिकारियों ने उसे वापस लेने से इनकार कर दिया।
पहले भी मिला था राहत
मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर सिंगल बेंच ने शिक्षक की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने खंडपीठ में अपील की।
सरकार का पक्ष और कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया कि सर्विस कोड के नियम 76 के अनुसार लंबी अनुपस्थिति पर सेवा समाप्त करना जरूरी है। लेकिन अदालत ने जांच रिपोर्ट और हालात को देखते हुए माना कि शिक्षक ने जानबूझकर ड्यूटी नहीं छोड़ी थी, बल्कि वह गंभीर मानसिक बीमारी से जूझ रहा था।
अपील खारिज, पुनर्विचार का आदेश
अदालत ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए कहा कि सिर्फ मेडिकल कारणों से हुई देरी पर बर्खास्तगी जैसी सख्त सजा देना उचित नहीं है। कोर्ट ने सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा और सरकार को निर्देश दिया कि मामले पर फिर से विचार करते हुए कर्मचारी को कम सजा देने पर फैसला लिया जाए।

