सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला मामले की सुनवाई, “धर्म को सामाजिक सुधार के नाम पर खोखला नहीं किया जा सकता”

Sabarimala case : सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सबरीमला मंदिर मामले में दायर Review Petition पर सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि समाज कल्याण या सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को कमजोर या खोखला नहीं किया जा सकता। साथ ही कोर्ट ने यह भी माना कि लाखों लोगों की आस्था और मान्यताओं को गलत या त्रुटिपूर्ण घोषित करना अदालत के लिए बेहद कठिन काम है।

यह मामला नौ जजों की संविधान पीठ के सामने चल रहा है, जो केरल के Sabarimala Temple समेत धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक आजादी से जुड़े सवालों पर विचार कर रही है।

सुनवाई के दौरान पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत सहित कुल नौ जज शामिल रहे। वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी ने त्रावणकोर देवस्वओम बोर्ड (TDB) की ओर से पक्ष रखा, जो सबरीमला मंदिर का प्रबंधन करता है।

धार्मिक अधिकारों और सामाजिक सुधार पर बहस

सुनवाई में यह मुद्दा उठा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थानों के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। पक्षकारों ने कहा कि सार्वजनिक धार्मिक संस्थानों में सुधार के लिए कानून बनाया जा सकता है, लेकिन धार्मिक समूहों को अपने रीति-रिवाज तय करने का भी अधिकार है।

Justice B.V. Nagarathna ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता। वहीं जस्टिस एम.एम. सुंदरेश ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार कानून जैसे बदलाव सामाजिक सुधार के उदाहरण हैं।

PIL और धार्मिक परंपराओं पर सवाल

सुनवाई के दौरान यह भी तर्क दिया गया कि कोई तीसरा व्यक्ति जनहित याचिका (PIL) के जरिए सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं पर सवाल नहीं उठा सकता। अदालत को ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई के लिए उच्च सीमा तय करनी चाहिए।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सिर्फ इसलिए किसी PIL पर विचार नहीं किया जा सकता क्योंकि याचिकाकर्ता आस्थावान नहीं है या सीधे प्रभावित पक्ष नहीं है।

सबरीमला मामले का पृष्ठभूमि

साल 2018 में Supreme Court ने 4:1 के फैसले में सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक बताया था। बाद में 2019 में इस मुद्दे को बड़ी पीठ के पास भेज दिया गया।

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