मिडिल ईस्ट में ‘तेल की जंग’ से बढ़कर ‘पानी की जंग’ का खतरा, निशाने पर आए वाटर प्लांट

New Delhi: मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को अब तक तेल के लिए महायुद्ध माना जा रहा था, लेकिन अब आशंका जताई जा रही है कि यह संघर्ष पानी के लिए युद्ध का रूप भी ले सकता है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि सैन्य ठिकानों और तेल सुविधाओं के बाद अब समुद्री पानी को पीने लायक बनाने वाले वाटर डिसेलिनेशन प्लांट भी हमलों के निशाने पर आ गए हैं।
हालांकि भारत, चीन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देश तेल की बढ़ती कीमतों से प्रभावित हो रहे हैं, लेकिन खाड़ी देशों के सामने पानी का गंभीर संकट पैदा होने का खतरा मंडरा रहा है।

वाटर प्लांट पर हमलों से बढ़ी चिंता

रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान में एक वाटर प्लांट पर हमला हुआ, जिसके बाद बहरीन के एक डिसेलिनेशन प्लांट पर ड्रोन हमला किया गया। ये प्लांट समुद्र के खारे पानी को शुद्ध कर पीने योग्य बनाने का काम करते हैं और खाड़ी देशों की बड़ी आबादी की प्यास बुझाते हैं।

ईरान ने दावा किया है कि उसके एक वाटर प्लांट को निशाना बनाया गया है। जिस प्लांट पर हमला हुआ वह होर्मुज स्ट्रेट के पास केशम द्वीप पर स्थित है। इस हमले के बाद बड़े इलाके में पानी की सप्लाई प्रभावित हो गई।

बहरीन के प्लांट पर ड्रोन हमला

इसी तरह बहरीन के एक वॉटर डिसेलिनेशन प्लांट पर भी ड्रोन हमला हुआ था। यह प्लांट वहां की आबादी को पीने का पानी उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाता है। इन घटनाओं के बाद पूरे क्षेत्र में पानी की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।

खाड़ी देशों की लाइफलाइन हैं डिसेलिनेशन प्लांट

मिडिल ईस्ट के अधिकांश देश रेगिस्तानी हैं, जहां प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत बेहद सीमित हैं। यहां जीवन का सबसे बड़ा आधार तेल नहीं बल्कि समुद्र का पानी है, जिसे डिसेलिनेशन तकनीक से पीने योग्य बनाया जाता है।

डिसेलिनेशन प्लांट समुद्र के खारे पानी से नमक और अन्य अशुद्धियां हटाकर उसे शुद्ध पेयजल में बदलते हैं। खाड़ी देशों में पानी की सप्लाई काफी हद तक इन्हीं प्लांट्स पर निर्भर है।

दुनिया के 60% डिसेलिनेशन प्लांट खाड़ी में

दुनिया भर की कुल डिसेलिनेशन क्षमता का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों में है। फारस की खाड़ी के आसपास 400 से ज्यादा वॉटर डिसेलिनेशन प्लांट मौजूद हैं, जिन पर युद्ध के दौरान खतरा बढ़ गया है।

अगर इन प्लांट्स को निशाना बनाया गया तो सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में करोड़ों लोग पानी के लिए तरस सकते हैं। कतर और बहरीन जैसे छोटे देश भी इस संकट से अछूते नहीं रहेंगे।

ड्रोन और मिसाइल हमले का खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे विशाल प्लांट ड्रोन, मिसाइल या रॉकेट हमलों के लिए संवेदनशील हो सकते हैं। ईरान समर्थित हुती और अन्य विद्रोही गुट पहले भी सऊदी अरब के तेल ठिकानों और बुनियादी ढांचे पर ड्रोन हमले कर चुके हैं।

इसके अलावा समुद्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगें पाइपलाइन को नुकसान पहुंचा सकती हैं, जिनसे समुद्र का पानी प्लांट तक पहुंचता है। आधुनिक डिसेलिनेशन प्लांट पूरी तरह कंप्यूटर और सेंसर आधारित SCADA सिस्टम पर चलते हैं, जिन्हें साइबर हमलों के जरिए भी निशाना बनाया जा सकता है।

हमले के गंभीर परिणाम

अगर खाड़ी देशों के किसी बड़े वाटर प्लांट पर हमला होता है, तो इसके असर कुछ ही घंटों में दिखाई देने लगेंगे। कतर, कुवैत और यूएई जैसे देशों में रणनीतिक जल भंडार सीमित होते हैं, जो केवल कुछ दिनों तक ही पानी की आपूर्ति बनाए रख सकते हैं।

प्लांट बंद होते ही शहरों में पानी की भारी किल्लत पैदा हो सकती है। मिडिल ईस्ट के कई प्लांट बिजली उत्पादन से भी जुड़े हैं, इसलिए इन पर हमले से बिजली आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है। बिना पानी के रियाद, दुबई और अबू धाबी जैसे बड़े शहरों में सामान्य जीवन चलाना मुश्किल हो जाएगा।

पहले भी सामने आ चुका है जल युद्ध का खतरा

इतिहास में भी ऐसे उदाहरण सामने आ चुके हैं। 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान इराक ने कुवैत के एक वाटर प्लांट को नुकसान पहुंचाया था, जिससे वहां पर्यावरण और जल संकट की स्थिति पैदा हो गई थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि सऊदी अरब और इजरायल के तटीय इलाकों में स्थित कई डिसेलिनेशन प्लांट विद्रोही संगठनों की संभावित टारगेट लिस्ट में शामिल हैं।

सुरक्षा के लिए मिसाइल डिफेंस तैनात

इस खतरे को देखते हुए सऊदी अरब समेत कई देशों ने अपने वाटर डिसेलिनेशन प्लांट के आसपास पैट्रियट और आयरन डोम जैसे मिसाइल डिफेंस सिस्टम तैनात किए हैं।
इसके अलावा कई देश अब बड़े भूमिगत जल भंडार तैयार कर रहे हैं, ताकि युद्ध जैसी स्थिति में भी कई हफ्तों तक पानी की आपूर्ति जारी रखी जा सके। साथ ही एक बड़े प्लांट की जगह कई छोटे-छोटे प्लांट लगाने की रणनीति अपनाई जा रही है, जिससे किसी एक प्लांट पर हमला होने पर पूरी सप्लाई प्रभावित न हो।

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