US and Iran War: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और जारी टकराव के बीच अब शांति समझौते का दबाव तेज हो गया है। संघर्ष के कई हफ्तों बाद दोनों देशों के सामने विकल्प सीमित होते जा रहे हैं।इस्लामाबाद में लंबी बातचीत के बावजूद अंतिम समझौता नहीं हो पाया, लेकिन दोनों पक्षों ने वार्ता जारी रखने के संकेत दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कूटनीतिक स्तर पर ऐसे फॉर्मूले पर चर्चा हो रही है, जिसे अमेरिका और ईरान दोनों अपनी ‘ऐतिहासिक जीत’ बता सकें।अमेरिका पर बढ़ती महंगाई और तेल की कीमतों का दबाव है, वहीं ईरान लगातार बमबारी और सैन्य नुकसान के कारण दबाव में है। ऐसे में दोनों देश समझौते का रास्ता तलाश रहे हैं।
1. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलना सबसे बड़ी शर्त
रिपोर्ट के मुताबिक शांति समझौते की पहली बड़ी शर्त स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से जहाजों के लिए खोलना है। अमेरिकी नाकाबंदी से ईरान की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है। इसके साथ ही कई सहयोगी देशों को भी नुकसान हुआ है। ईरान को भी समझ है कि चीन जैसे देशों पर दबाव कम करने के लिए समुद्री रास्ता खोलना जरूरी है। फिलहाल दोनों देश इस मुद्दे की बारीकियों पर चर्चा कर रहे हैं।
2. परमाणु संवर्धन पर खींचतान
परमाणु संवर्धन यानी न्यूक्लियर एनरिचमेंट पर भी दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। ईरान पांच साल तक संवर्धन रोकने का प्रस्ताव दे रहा है, जबकि अमेरिका 20 साल तक रोक चाहता है। माना जा रहा है कि दोनों पक्ष बीच का रास्ता निकाल सकते हैं। इसके अलावा ईरान के पास मौजूद 60 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम को रूस भेजने या अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में नष्ट करने पर भी चर्चा हो रही है।
3. लेबनान और इजरायल मुद्दे को अलग रखना
रिपोर्ट में कहा गया है कि शांति वार्ता में लेबनान, इजरायल और हिज्बुल्लाह से जुड़े मुद्दों को अलग रखा गया है। लेबनान सरकार और इजरायल के बीच बातचीत शुरू हो चुकी है, लेकिन हिज्बुल्लाह के हथियार छोड़ने की संभावना फिलहाल कम है। अमेरिका और ईरान इस जटिल मुद्दे को अलग रखकर पहले द्विपक्षीय समझौते पर आगे बढ़ना चाहते हैं।
4. अमेरिका की घरेलू राजनीति भी अहम
रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह समझौता घरेलू राजनीति में भी अहम साबित हो सकता है। अमेरिका में महंगाई और ईंधन की कीमतों ने सरकार पर दबाव बढ़ाया है। ऐसे में ट्रंप एक ऐसा समझौता चाहते हैं जिसे वे 2015 के परमाणु समझौते से बेहतर बता सकें। ट्रंप यह दिखाना चाहते हैं कि उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लंबे समय के लिए कमजोर कर दिया है।
5. ईरान पर भी बढ़ा दबाव
लगातार हवाई हमलों के बाद ईरान की सैन्य और प्रशासनिक क्षमता कमजोर हुई है। नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता और आईआरजीसी के कई कमांडरों के मारे जाने से तेहरान पर दबाव बढ़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान इस समझौते के जरिए अपनी अर्थव्यवस्था को संभालना और भविष्य के संकट से बचना चाहता है।
समझौते के बाद भी बनी रहेगी चुनौती
रिपोर्ट में कहा गया है कि भले ही समझौता हो जाए, लेकिन युद्ध की घटनाओं ने ईरान के कट्टरपंथी गुटों में यह धारणा मजबूत कर दी है कि सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार जरूरी हैं। ऐसे में समझौते के बाद भी क्षेत्रीय तनाव पूरी तरह खत्म होना आसान नहीं होगा, लेकिन यह कदम युद्ध को रोकने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

