Bengal SIR Case: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल SIR मामले की सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस देश में व्यक्ति पैदा हुआ है, वहां वोट देना सिर्फ अधिकार नहीं बल्कि एक भावनात्मक मुद्दा भी है। अदालत ने कहा कि आने वाले चुनाव की धूल और आक्रोश के कारण न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि एक मजबूत अपीलीय मंच की जरूरत है, ताकि जिन लोगों का नाम मतदाता सूची से हटाया गया है, उन्हें न्याय मिल सके। अदालत ने यह टिप्पणी कुरैशा यास्मिन नाम की महिला की याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिनका नाम SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटा दिया गया था।
“लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” सिर्फ बंगाल में क्यों: कोर्ट
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने निर्वाचन आयोग से कई सवाल किए। उन्होंने कहा कि “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” कैटेगरी केवल पश्चिम बंगाल में ही क्यों सामने आई, जबकि अन्य राज्यों में ऐसा नहीं हुआ। कोर्ट ने यह भी कहा कि पहले निर्वाचन आयोग का रुख था कि वर्ष 2002 की मतदाता सूची में शामिल लोगों को दस्तावेज जमा करने की जरूरत नहीं होगी। लेकिन अब आयोग अपने पहले के रुख से अलग दिखाई दे रहा है। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग और राज्य के बीच भरोसे की कमी को देखते हुए न्यायिक अधिकारियों की मदद ली गई थी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इस मामले के लिए बनाए गए अपीलीय ट्रिब्यूनल में जाने की सलाह दी।
मतदाता सूची ‘फ्रीज’ होने का क्या मतलब
निर्वाचन आयोग ने पहले चरण के मतदान वाली सीटों के लिए 9 अप्रैल को मतदाता सूची को अंतिम रूप देकर उसे फ्रीज कर दिया था।पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को होंगे, जबकि मतगणना 4 मई को की जाएगी। मतदाता सूची फ्रीज होने का मतलब यह है कि जिन लोगों का नाम सूची से हटा दिया गया है, उन्हें इस चुनाव में शामिल नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में SIR प्रक्रिया के दौरान सात न्यायिक अधिकारियों के घेराव से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई भी करेगी।
SIR के बाद 91 लाख नाम हटाए जाने से विवाद
पश्चिम बंगाल में SIR अभियान के बाद मतदाता सूची से करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने का मामला राजनीतिक विवाद बन गया है। यह जानकारी निर्वाचन आयोग के आंकड़ों से सामने आई है। पहले चरण के चुनाव से पहले इस मुद्दे ने सियासी माहौल को और गरमा दिया है। ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग पर आरोप लगाया कि राज्य में मतुआ, राजबंशी और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर उनके नाम हटाए गए हैं। वहीं शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है। इस पूरे विवाद के बीच पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल और ज्यादा गरमाता दिख रहा है।

